बालिकाओं की सुरक्षा का मतलब सिर्फ शरीर की रक्षा नहीं, बल्कि उन्हें भयमुक्त करना है: CJI गवई

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश  बीआर गवई ने शनिवार को कहा कि बालिकाओं की सुरक्षा का मतलब सिर्फ उनके शरीर की रक्षा करना नहीं है, बल्कि उन्हें भय से मुक्त करना है. उन्होंने ऐसे समाज के निर्माण पर जोर दिया, जहां बालिकाएं सम्मान के साथ अपना सिर ऊंचा रख सकें और जहां उनकी आकांक्षाएं शिक्षा और समानता से पोषित हों.

डिजिटल युग की पृष्ठभूमि में, सीजेआई गवई ने ऑनलाइन उत्पीड़न, साइबर धमकी और डिजिटल स्टॉकिंग के साथ-साथ व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग और डीपफेक तस्वीरों के कारण बालिकाओं की असुरक्षा (Vulnerability) को चिह्नित किया. उन्होंने विशेष कानूनों के निर्माण और कानून प्रवर्तन अधिकारियों और निर्णय निर्माताओं के प्रशिक्षण पर जोर दिया.

यूनिसेफ इंडिया के सहयोग से सुप्रीम कोर्ट की किशोर न्याय समिति (जेजेसी) के तत्वावधान में आयोजित “बालिकाओं की सुरक्षा: भारत में उनके लिए सुरक्षित और सक्षम वातावरण की स्थिति” विषय पर राष्ट्रीय वार्षिक हितधारक परामर्श में बोलते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश गवई ने रवींद्रनाथ टैगोर की कविता, “Where the Mind is Without Fear” का स्मरण करते हुए कहा कि यह बालिकाओं की सुरक्षा के लिए किए जाने वाले प्रयासों का सार प्रस्तुत करती है.

उन्होंने कहा, “यह दृष्टिकोण तब तक अधूरा रहेगा जब तक हमारे देश में कोई भी लड़की भय में रहेगी – हिंसा के भय में, भेदभाव के भय में, या सीखने और सपने देखने के अवसर से वंचित किए जाने के भय में.”

सीजेआई बीआर गवई ने कहा कि जब बालिकाएं स्वतंत्रता और सम्मान के वातावरण में पलेंगी, तभी यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि देश उस “स्वतंत्रता के स्वर्ग” में जागृत हो गया है, जिसके बारे में टैगोर ने इतनी खूबसूरती से बात की थी. उन्होंने कहा कि देश भर में कई लड़कियों को, संवैधानिक और कानूनी गारंटी के बावजूद, उनके मौलिक अधिकारों और यहां तक कि जीवनयापन के लिए बुनियादी आवश्यकताओं से भी वंचित रखा जाता है.

जस्टिस गवई ने कहा कि यह कमजोरी उन्हें यौन दुर्व्यवहार, शोषण और हानिकारक प्रथाओं, जैसे कि महिला जननांग विकृति, कुपोषण, लिंग के अधार गर्भपात, तस्करी और उनकी इच्छा के खिलाफ बाल विवाह के अत्यधिक जोखिम के प्रति उजागर करती है. उन्होंने कहा, “उसकी (बालिका की) सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल उसके शरीर की रक्षा करना नहीं है, बल्कि उसकी आत्मा को स्वतंत्र करना है. एक ऐसा समाज बनाना है जहां वह सम्मान के साथ अपना सिर ऊंचा रख सके और जहां उसकी आकांक्षाओं को शिक्षा और समानता से पोषण मिले… हमें उन गहरी जड़ें जमाए हुए पितृसत्तात्मक रीति-रिवाजों का मुकाबला करना होगा और उससे बाहर निकलना होगा जो लड़कियों को उनके उचित स्थान से वंचित करते रहे हैं.”

जस्टिस गवई ने कहा कि ऑनलाइन उत्पीड़न, साइबर-धमकी और डिजिटल स्टॉकिंग से लेकर व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग और डीपफेक तस्वीरों तक, बड़े पैमाने पर चुनौतियां और बनावटी चीजें दोनों विकसित हुई हैं. उन्होंने कहा, “पुलिस अधिकारियों, शिक्षकों, स्वास्थ्य पेशेवरों और स्थानीय प्रशासकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों में संवेदनशील दृष्टिकोण शामिल होना चाहिए, जिससे वे सहानुभूति, सूक्ष्मता और प्रासंगिक समझ के साथ प्रतिक्रिया दे सकें.”

News 7
Author: News 7

Leave a Comment

और पढ़ें

Orpheus Financial