भारतीय रुपया बुधवार को इतिहास में पहली बार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ₹90.32 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया. अप्रैल 2025 से अब तक रुपये में लगभग 4–5% की गिरावट दर्ज की गई है. लगातार कमजोर हो रही वैश्विक आर्थिक स्थिति, डॉलर की मजबूती और घरेलू अनिश्चितताओं ने रुपये पर भारी दबाव डाला है.
साल 1947 में 1 डॉलर की कीमत ₹3.30 थी, जो अब बढ़कर ₹90.32 हो चुकी है—यानी लगभग 78 वर्षों में रुपये में 27 गुना तक गिरावट दर्ज की गई.
अमेरिका में ब्याज दरें ऊँची रहने और निवेशकों द्वारा सुरक्षित निवेश की ओर बढ़ने से डॉलर मजबूत हुआ, जिससे सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएँ प्रभावित हुईं.
अप्रैल 2025 से FPI के प्रवाह में कमी आई. विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने रुपये पर दबाव बढ़ाया.
तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रसायन आयात करने वाली कंपनियों को बड़े पैमाने पर डॉलर खरीदने पड़े, जिससे रुपये की मांग कम और दबाव बढ़ा.
सौदे की घोषणा बार-बार टलने से विदेशी निवेशकों में अनिश्चितता और डॉलर की ओर रुझान बढ़ा.
बाजार में डॉलर की संभावित कमी और वैश्विक तनाव के कारण सट्टेबाजों द्वारा भारी डॉलर खरीद की गई, जिससे रुपया और दबाव में आया.
रुपये की कमजोरी से विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में बिकवाली बढ़ाई है. बाजार में अस्थिरता बढ़ी है और निवेशकों के पोर्टफोलियो पर असर दिखाई दे रहा है. म्यूचुअल फंड निवेशक भी निकट भविष्य में कम रिटर्न देख सकते हैं.
डॉलर महंगा होने से विदेशी विश्वविद्यालयों की फीस, टिकट, रहन-सहन, बीमा सबकी लागत 10–15% तक बढ़ने का अनुमान है. छात्रों और पर्यटकों को अधिक रुपये खर्च करने पड़ेंगे. रुपये की यह गिरावट सिर्फ विनिमय दर में बदलाव नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक चुनौतियों, वैश्विक बाज़ार की अनिश्चितता और नीतिगत कारकों का मिश्रित प्रभाव है.










