इस्तांबुल: अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव कम करने के प्रयासों को उस समय झटका लगा जब इस्तांबुल में चार दिनों तक चली वार्ता बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान ने पाकिस्तान के खिलाफ अफगानिस्तानी जमीन के इस्तेमाल को रोकने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई. साथ ही यह भी माँग की कि पाकिस्तान अफगानिस्तानी हवाई क्षेत्र का उल्लंघन बंद करे. इसके अलावा अफगानिस्तान की सीमाओं के भीतर अमेरिकी ड्रोन हमले बंद करे.
हालाँकि, पाकिस्तान ने इन शर्तों को मानने से इनकार कर दिया. प्रमुख मांगों पर असहमति के बाद पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल कथित तौर पर वार्ता से बाहर चला गया, जिससे चर्चा रुक गई. गतिरोध पर टिप्पणी करते हुए फ्रांस में अफगानिस्तान के पूर्व राजदूत उमर समद ने पाकिस्तान की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि प्रत्येक पक्ष की मंशा क्या थी. क्या पाकिस्तान वास्तव में व्यावहारिक समाधान चाह रहा था, या वह ऐसा दिखाने की कोशिश कर रहा था मानो वह मुद्दों को सुलझाना चाहता है?’
यह गतिरोध तब और गहरा गया जब इस्लामाबाद ने कथित तौर पर काबुल से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को औपचारिक रूप से आतंकवादी संगठन घोषित करने और उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने का अनुरोध किया. रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान के रक्षा मंत्री मौलवी मोहम्मद याकूब मुजाहिद ने इस मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पाकिस्तान और अन्य देश अपने विरोधियों के खिलाफ राजनीतिक उद्देश्यों के लिए आतंकवाद का लेबल इस्तेमाल करते हैं.’
इस्तांबुल वार्ता से पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने चेतावनी दी थी कि अगर बातचीत से कोई नतीजा नहीं निकलता है, तो इस्लामाबाद सैन्य कार्रवाई का सहारा ले सकता है. इसके विपरीत, अफगानिस्तान ने जोर देकर कहा कि वह राजनयिक माध्यमों से विवादों को सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है.
इस्लामिक अमीरात के प्रथम उप-आंतरिक मंत्री मोहम्मद नबी ओमारी ने काबुल की स्थिति की पुष्टि करते हुए कहा, ‘उच्चतम स्तर से लेकर निम्नतम स्तर तक, अफगानिस्तान के इस्लामिक अमीरात की हस्तक्षेप नहीं करने की नीति है और वह अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता है.’
इस्तांबुल वार्ता कतर और तुर्की की मध्यस्थता में एक अस्थायी युद्धविराम के बाद हुई थी, जब पाकिस्तान ने इस महीने की शुरुआत में कथित तौर पर अफगान हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया था. इसके बाद काबुल की ओर से जवाबी कार्रवाई शुरू हो गई थी. 17 अक्टूबर को शुरू हुई वार्ता का नवीनतम दौर अब बिना किसी ठोस प्रगति के समाप्त हो गया है. इससे द्विपक्षीय संबंधों में सुधार की उम्मीदें कम हो गई है.










