मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100वीं सालगिरह के मौके पर रविवार को मुंबई में आयोजित एक लेक्चर सीरीज में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर कहा कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है. उन्होंने कहा, “किसी भी जाति का व्यक्ति RSS में सबसे ऊंचे पद पर पहुंच सकता है. अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होना कोई बाधा नहीं है. साथ ही, ब्राह्मण होना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है.”
भागवत ने कहा कि जब संघ की स्थापना हुई थी, तब संगठन में ब्राह्मण अधिक थे, लेकिन संघ सभी जातियों के लिए काम करता है. उन्होंने साफ किया कि संघ का सरसंघचालक (चीफ) जरूरी नहीं कि ब्राह्मण, क्षत्रिय या किसी अन्य विशेष जाति का हो. जो भी सरसंघचालक बनता है, वह बस एक हिंदू होता है.
उन्होंने कहा कि ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द गलत है. इसे संप्रदाय-तटस्थता (sect-neutrality) कहा जाना चाहिए, क्योंकि धर्म ही जीवन की नींव है.
उन्होंने कहा कि भारत कोई भौगोलिक नाम नहीं है; यह एक विशेषता है. हिंदू कोई संज्ञा नहीं है; यह एक विशेषण है. भारत में रहने वाला हर व्यक्ति हिंदू है.
मोहन भागवत ने कहा कि संघ ने पहले ही तय कर लिया है कि वह पूरे समाज को संगठित करने के अलावा कोई काम नहीं करेगा. संघ का काम अनोखा है. दुनिया में कहीं और ऐसा काम नहीं है. अब हम इसे खुद अनुभव कर रहे हैं. संघ का काम पूरे भारत देश के लिए है. संघ समाज के प्रेम और अपने स्वयंसेवकों की भक्ति से चलता है.
भाषा के मुद्दे पर बोलते हुए भागवत ने कहा, “हम अंग्रेजी भाषा के खिलाफ नहीं हैं. जहां अंग्रेजी के बिना काम नहीं हो सकता, वहां हम अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, हमारी कोशिश हमेशा मातृभाषा या हिंदी का इस्तेमाल करने की होती है.”
‘घर वापसी’ के मुद्दे पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हर धार्मिक विश्वास का सम्मान किया जाना चाहिए. हालांकि, जहां जबरन धर्म परिवर्तन हुआ है, वहां संबंधित लोगों को उनकी इच्छा के अनुसार उनके मूल धर्म में वापस लाने के बारे में चर्चा की जा सकती है.
मुस्लिम-बहुल इलाकों में काम करते समय आने वाली मुश्किलों का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि अगर गाली-गलौज भी हो, तो उस पर प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे विवाद बढ़ सकता है. भाषाई कट्टरता के बारे में उन्होंने इसे ‘स्थानीय बीमारी’ बताया और राय दी कि इसे फैलने नहीं देना चाहिए.










