नई दिल्ली: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि पश्चिम बंगाल में ‘बड़े पैमाने पर वोटर डिलीट करने’ के आरोप लगाए गए हैं वो सब झूठ है। और यह सिर्फ अपने राजनीतिक फायदे के लिए ऐसे झूठे आरोप लगाए जा रहे है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने 11 नवंबर को कांग्रेस की पश्चिम बंगाल यूनिट और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेताओं की तरफ से राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण- एसआईआर अभियान को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा था.
चुनाव आयोग ने पिछले हफ्ते तृणमूल कांग्रेस की सांसद डोला सेन और दूसरों की याचिका पर 81 पेज का जवाबी हलफनामा दाखिया किया. चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में 30 फीसदी तक वोटरों के नाम बाहर होने के आरोपों को गलत बताया. चुनाव आयोग ने कहा कि 99.77 फीसदी मौजूदा वोटरों को पहले से भरे हुए गणना फॉर्म दिए जा चुके हैं और 70.14 प्रतिशत फॉर्म वापस मिल गए हैं.
चुनाव आयोग ने कहा कि ऐसे बदलाव करने की उसकी शक्तियां संविधान के आर्टिकल 324 और 326, और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और वोटर्स के रजिस्ट्रेशन के नियम के अलग-अलग प्रावधानों में मजबूती से शामिल है. चुनाव आयोग ने कहा कि पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर वोट न मिलने का आरोप निहित राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए बढ़ाया जा रहा है.
इसमें कहा गया, ‘यह कहा जाता है कि आरपी एक्ट 1950 के सेक्शन 16, 19, और 22 के साथ आर्टिकल 324 और 326 को नियम 21A के साथ पढ़ने पर यह साफ हो जाता है कि चुनाव आयोग के पास वोट देने के संवैधानिक अधिकार को लागू करने के लिए वोटर्स की नागरिकता सहित योग्यता का आकलन करने की शक्ति है.’
चुनाव आयोग ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण- एसआईआर अभियान के बारे में जारी गाइडलाइंस संवैधानिक है और वोटर लिस्ट की शुद्धता बनाए रखने के हित में हैं जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए एक शर्त है और संविधान का एक बुनियादी हिस्सा है. सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल विशेष गहन पुनरीक्षण- एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 9 दिसंबर को सुनवाई करेगा.










