नई दिल्ली: आज कल सियासी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। कांग्रेस और बीजेपी में जंग छिड़ी हुई है। आज शनिवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने विपक्षी ‘INDIA’ गठबंधन द्वारा आयोजित एक प्रतीकात्मक ‘मॉक संसद’ (जन महाभियोग) कार्यक्रम आयोजित किया गया। विपक्ष ने जनता के बीच अपनी बात रखने के लिए इस प्रतीकात्मक ‘मॉक संसद’ और जन-महाभियोग का रास्ता चुना। इस विशेष कार्यवाही की अध्यक्षता पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने की।
इस कार्यक्रम में विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए। खरगे ने अपने संबोधन में कहा कि देश के नागरिकों, विशेषकर महिलाओं, युवाओं और कमजोर वर्गों के वोट का अधिकार आज गंभीर खतरे में है। इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने की मांग की है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष के 6 प्रमुख आरोप
- सत्ता के इशारे पर काम करना: खरगे ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त स्वतंत्र रूप से काम करने के बजाय पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के सीधे निर्देशों पर चुनाव आयोग को चला रहे हैं।
- वोटों की कथित चोरी : खरगे ने आरोप लगाया कि 2014 से सत्ता में बने रहने के लिए विपक्षी दलों को तोड़ने और सरकारों को गिराने के बाद अब सीधे तौर पर “वोट चोरी” की साजिश रची जा रही है।
- करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाना: SIR प्रक्रिया के तहत कथित तौर पर 13.3 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। विपक्ष का दावा है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह अपारदर्शी और पक्षपातपूर्ण थी।
- नियमों में मनमाना बदलाव: संसदीय निगरानी या बिना किसी पूर्व सूचना के नियमों के ‘फॉर्म 6’ को दोबारा लिखा गया, जिससे नए मतदाताओं और युवाओं के लिए पंजीकरण कराना कठिन हो गया।
- सॉफ्टवेयर के माध्यम से चुनावी सूचियों पर पूरी तरह से केंद्रीय नियंत्रण कर लिया गया ताकि चुनिंदा तरीके से नाम हटाए और जोड़े जा सकें।
- अन्य आयुक्तों को दरकिनार करना: मुख्य चुनाव आयुक्त ने संवैधानिक जनादेश का उल्लंघन करते हुए बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों को निर्णय लेने की प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रखा, जबकि उन्होंने ऑन-रिकॉर्ड कई आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
इस प्रतीकात्मक महाभियोग कार्यक्रम में राहुल गांधी समेत INDIA गठबंधन के 21 विपक्षी दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। खरगे ने स्पष्ट किया कि उनकी यह लड़ाई किसी व्यक्तिगत दुश्मनी के लिए नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और संविधान की रक्षा के लिए है ताकि चुनाव आयोग निष्पक्ष ढंग से काम कर सके।









