नई दिल्ली: इंडियन मुस्लिम्स फॉर सिविल राइट्स द्वारा जवाहर भवन, नई दिल्ली में 14 सितंबर को “कानून का शासन” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देश भर के वरिष्ठ न्यायाधीशों, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों और मानव अधिकार एवं सामाजिक संगठनों के नेताओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

इस संगोष्ठी की अध्यक्षता, इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर के अध्यक्ष एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने की, जबकि जानेमाने मुस्लिम बुद्धिजीवी, इंडियन मुस्लिम्स फॉर सिविल राइट्स के अध्यक्ष और पूर्व सांसद मुहम्मद अदीब ने मुख्य भाषण दिया। उन्होंने कहा कि आई.एम.सी.आर की स्थापना केवल मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि, इसकी स्थापना सभी समुदायों के अधिकारों की रक्षा और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के लिए की गई थी। उन्होंने कहा कि कानून का शासन स्थापित करना और संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित करना इसका मुख्य उद्देश्य है। मुहम्मद अदीब ने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत के वकील आगे आकर लोगों को न्याय दिलाने के लिए अपनी भूमिका निभाएं। इस दौरान उन्होंने संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के महत्व पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि जब कानून का शासन कमजोर होता है, तो लोकतंत्र की नींव हिल जाती है। न्याय और निष्पक्षता की रक्षा के लिए लोगों को एकजुट होना होगा।

इस सेमिनार को कई मशहूर हस्तियों ने संबोधित किया, जिनमें मोहम्मद खालिद खान, पूर्व संयुक्त सचिव, राज्यसभा सचिवालय, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता फ़ुज़ैल अहमद अयूबी, पटना हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति इकबाल अहमद अंसारी, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय आर. हेगड़े, बॉम्बे हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता मुबीन हारून सोलकर, सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता रश्मि सिंह, वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया, गांधीवादी एवं पूर्व आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर वी.के. त्रिपाठी, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अनस तनवीर, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता जेड.के. फैजान, अलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता खुर्शीद अहमद, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं ‘सामला’ के महासचिव फिरोज अहमद गाजी, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता निज़ामुद्दीन पाशा, इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एच. मेहदी रिजवी सहित कई प्रमुख वकीलों और महत्वपूर्ण हस्तियों ने अपने विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने वकीलों की ज़िम्मेदारी पर ज़ोर दिया और कहा कि जब संस्थाएँ दबाव में हों, तो वकीलों का कर्तव्य है कि वे संवैधानिक, नैतिकता के संरक्षक बनें और हर परिस्थिति में न्याय को सुनिश्चित करें। उन्होंने कानून को पूरी पारदर्शिता और व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर लागू कराने पर ज़ोर दिया।

पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति इकबाल अहमद अंसारी ने कहा कि बतौर जज जब हम ऐसे किसी सेमिनार में जाते हैं जहां न्याय पर आलोचना की जा रही हो, तो बड़ी शर्म और लज्जा महसूस होती है, उन्होंने न्याय की लोकप्रियता की आलोचना करते हुए कहा कि जेल में बंद उमर खालिद का मामला सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय का नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक की समस्या है। यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता को बचाने का संघर्ष है। उन्होंने कहा कि सरकारें देश नहीं बनातीं। सरकारें आती-जाती रहेंगी और देश हमेशा बना रहेगा।
सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने वकील फ़ुज़ैल अहमद अयूबी ने आई.एम.सी.आर के महत्व और उसके न्यायिक हस्तक्षेप पर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की।
आई.एम.सी.आर के महासचिव एवं पूर्व सचिव राज्यसभा सचिवालय मुहम्मद खालिद खान ने जन जागरूकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि समाज को न केवल आज, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना फजलुर रहीम मुजद्दिदी ने कहा कि अगर किसी कमजोर व्यक्ति को न्याय मिलता है, तो वहां की न्यायपालिका के बारे में पता चलता है। अगर ऐसा नहीं है, तो अदालत के साख पर सवाल उठता है। उन्होंने कहा कि कानूनी टीम के माध्यम से लोगों को न्याय दिलाने का प्रयास किया जाना चाहिए।सेमिनार में देश भर से बड़ी संख्या में वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जो न्याय, समानता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की रक्षा के लिए एक मजबूत और एकजुट प्रतिबद्धता को दर्शाता है। कार्यक्रम का संचालन एडवोकेट आकांक्षा रॉय ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. आजम बेग के कुरान पाठ से हुई। जबकि आई.एम.सी.आर के महासचिव सैयद मसूद हुसैन ने धन्यवाद प्रस्ताव पेश किया।










